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हर साल डूबने वाले गांवों को सुरक्षित बसाने की तैयारी

भोपाल। मध्यप्रदेश में हर साल बाढ़ और नदी के कटाव का सामना करने वाली आबादी को अब सिर्फ राहत और बचाव के भरोसे नहीं छोड़ा जाएगा। राज्य सरकार ने ऐसे गांवों और कस्बाई बसाहटों को चिन्हित कर उन्हें सुरक्षित स्थान पर बसाने की दिशा में नए सिरे से काम शुरू करने की तैयारी की है। शुरुआती तौर पर नर्मदा, चंबल और मंदाकिनी नदी के कैचमेंट क्षेत्र में आने वाली करीब 190 गांवों और आबादी को इस योजना के दायरे में लाने पर विचार किया जा रहा है। सरकार का फोकस उन बसाहटों पर रहेगा, जहां हर साल बाढ़ आने से सिर्फ मकान और खेत ही प्रभावित नहीं होते, बल्कि नदी के कटाव, बैकवाटर और जलभराव के कारण गांव की भौगोलिक स्थिति तक बदल जाती है। ऐसे स्थानों पर लंबे समय तक राहत पहुंचाने के बजाय सुरक्षित बसाहट विकसित करने की योजना तैयार की जाएगी।
प्रदेश में नर्मदा, चंबल और मंदाकिनी के अलावा स्थानीय नदियों और नालों के कारण भी कई गांवों में बार-बार बाढ़ आती है। रीवा, पन्ना और छतरपुर जैसे जिलों में भी स्थानीय जलस्रोतों के उफान से ग्रामीण और कस्बाई आबादी प्रभावित होती है। सरकारी स्तर पर अब यह आकलन किया जाएगा कि किन गांवों को बाढ़ से बचाव के स्थानीय इंतजामों से सुरक्षित किया जा सकता है और किन आबादी क्षेत्रों को स्थायी रूप से दूसरी जगह बसाना जरूरी होगा। इसके लिए बाढ़ की आवृत्ति, नदी का कटाव, बैकवाटर, सडक़ संपर्क और सुरक्षित ऊंचे स्थान जैसी परिस्थितियों को आधार बनाया जाएगा।
चंबल के 90 से ज्यादा गांवों पर ज्यादा खतरा
चंबल नदी के कैचमेंट क्षेत्र में श्योपुर, मुरैना और भिंड जिले सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। यहां 90 से अधिक गांवों में नदी के कटाव और बाढ़ के कारण जमीन की स्थिति लगातार बदल रही है। मुरैना के बीलपुर, कुथियाना, उमैंद, नावली और एसार सहित कई गांवों में हर साल मिट्टी का कटाव आबादी और कृषि भूमि के लिए खतरा बन रहा है। कटाव के कारण कई परिवारों के लिए अपने पुराने आवासों में रहना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे गांवों को सुरक्षित स्थान पर बसाना सरकार की प्रस्तावित रणनीति का अहम हिस्सा हो सकता है।
नर्मदा के बैकवाटर ने बदली कई गांवों की तस्वीर
नर्मदा नदी में बाढ़ और परियोजनाओं के बैकवाटर से बड़वानी, धार, खरगोन और आलीराजपुर सहित कई क्षेत्रों की ग्रामीण आबादी प्रभावित होती है। कई गांव बारिश के दौरान चारों ओर से पानी से घिरकर मुख्य आबादी से कट जाते हैं। बड़वानी के करोदिया, बाजरीखेड़ा, खापरखेड़ा, गेहलगांव, कसरावद और पिछोड़ी जैसे गांवों में ऐसी स्थिति कई बार बन चुकी है। इंदिरा सागर और सरदार सरोवर परियोजनाओं के बैकवाटर वाले क्षेत्रों में भी कई बसाहटों के सामने यही चुनौती बनी रहती है।
अगस्त में मंदाकिनी ने दिखाया खतरा
चित्रकूट क्षेत्र में मंदाकिनी नदी का जलस्तर बढऩे पर मध्यप्रदेश की ग्रामीण और कस्बाई आबादी प्रभावित होती है। अगस्त में आई बाढ़ के दौरान चित्रकूट से लगे 60 से ज्यादा गांवों के जलमग्न होने की स्थिति सामने आई थी। हजारों लोग प्रभावित हुए थे। ऐसे क्षेत्रों में भी सरकार को यह तय करना होगा कि बाढ़ से बचाव के लिए तटबंध और अन्य संरचनाएं पर्याप्त हैं या बसाहट को सुरक्षित स्थान पर ले जाना ज्यादा प्रभावी विकल्प होगा।
अतिक्रमण और खनन भी बढ़ा रहे जोखिम
विशेषज्ञों के मुताबिक नदियों के तटों पर अतिक्रमण, अनियोजित निर्माण और लगातार हो रहे रेत खनन से नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव आता है। इससे कई स्थानों पर कटाव बढ़ता है और तेज बारिश के दौरान बाढ़ का असर अधिक गंभीर हो सकता है। प्रस्तावित योजना में सिर्फ पुनर्वास ही नहीं, बल्कि नदी के तटों और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में निर्माण तथा अतिक्रमण की स्थिति की समीक्षा भी महत्वपूर्ण होगी।
तीन विभाग मिलकर बनाएंगे रणनीति
बाढ़ प्रभावित आबादी के स्थायी समाधान के लिए जल संसाधन विभाग, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग और नगरीय निकाय मिलकर काम करेंगे। पहले चरण में जोखिम वाले गांवों का चिन्हांकन और उनकी मौजूदा स्थिति का आकलन किया जाएगा। इसके बाद यह तय होगा कि कहां सुरक्षा संरचनाएं बनाई जाएं और कहां बसाहट को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया जाए। इस बार कोशिश यह है कि बाढ़ आने के बाद राहत पहुंचाने के बजाय बाढ़ से पहले ही जोखिम वाली बसाहटों का स्थायी समाधान तैयार किया जाए।

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