बांस से ब्रांड तक: सतना के जंगल से निकला ‘ग्रीन लक्जऱी’ का ग्लोबल मॉडल
तीन आईआईटीआईएन दोस्तों की सोच ने बदल दी गांव की पहचान, अब मिलिंद सोमन चलाएंगे बांस की ई-साइकिल

सतना। जिस बांस को कभी गांवों में टोकरी, मचिया और सीढ़ी बनाने तक सीमित समझा जाता था, वही आज दुनिया के सबसे महंगे ड्राइंग रूम और लग्जऱी विला की पहचान बन चुका है। यह कहानी सिर्फ एक बिजऩेस मॉडल की नहीं, बल्कि सोच, नवाचार और ग्रामीण हुनर के सम्मान की है—जो जन्मी है मध्य प्रदेश के सतना जिले के सोनौरा क्षेत्र से। यहां वन विश्राम गृह परिसर में संचालित एक यूनिट ने बांस को पारंपरिक उपयोग से निकालकर इंटरनेशनल लक्जऱी ब्रांड में बदल दिया है।

तीन आईआईटीआईएन दोस्त और एक क्रांतिकारी विचार
इस बदलाव के पीछे तीन युवा इंजीनियर— शशांक गौतम, अनंता वर्सने और ट्विंकल वर्सने—की दूरदृष्टि है। साल 2018 में बैंबू मिशन के तहत मिले एक सुझाव ने उन्हें बांस आधारित स्टार्टअप शुरू करने की प्रेरणा दी।

शशांक बताते हैं—हमने महसूस किया कि बांस को सिर्फ सस्ता कच्चा माल समझा जाता है, जबकि इसमें स्टील जितनी मजबूती और लकड़ी जैसी खूबसूरती है। हमारा लक्ष्य था—बांस को लक्जऱी क्लास तक पहुंचाना। यहीं से शुरू हुआ एक ऐसा प्रयोग, जिसने ग्रामीण उत्पादों की परिभाषा ही बदल दी। बांस की ई-साइकिल- तकनीक और प्रकृति का अनोखा संगम इस यूनिट का सबसे चर्चित उत्पाद है—बांस से बनी हाई-टेक ई-साइकिल। यह सिर्फ एक साइकिल नहीं, बल्कि ग्रीन मोबिलिटी का भविष्य है।

इसकी खासियतें—पूरा फ्रेम प्राकृतिक बांस से तैयार स्टील जितनी मजबूती, लेकिन बेहद हल्का वजन, एक चार्ज में लगभग 100 किलोमीटर रेंज, अधिकतम गति 25 किमी प्रति घंटा, आधुनिक आईओटी सिस्टम और स्मार्ट बैटरी टेक्नोलॉजी, इस अनोखी ई-साइकिल को फिटनेस आइकॉन मिलिंद सोमन ने अपने लिए ऑर्डर किया है। इसके अलावा सोनम कपूर और पूजा भट्ट सहित कई बॉलीवुड हस्तियां यहां के बांस आधारित प्रोडक्ट्स खरीद चुकी हैं।

50+ लक्जऱी प्रोडक्ट्स, 4000 से लाखों तक कीमत
यह यूनिट सिर्फ साइकिल तक सीमित नहीं है। यहां तैयार हो रहे उत्पादों की सूची किसी इंटरनेशनल डिजाइन स्टूडियो से कम नहीं— डिजाइनर लौंग और हैंगिंग लैंप, सोफा और डाइनिंग सेट, सेंटर टेबल, पेन होल्डर और डेकोर आइटम, कस्टमाइज्ड फर्नीचर, इनकी कीमत 4,000 से शुरू होकर लाखों रुपये तक जाती है।
सात समंदर पार पहुंची सतना की पहचान
आज इस यूनिट के प्रोडक्ट्स की मांग सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि— दुबई, मलेशिया, जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देशों में तेजी से बढ़ रही है। भारत में मुंबई, दिल्ली और इंदौर जैसे बड़े शहरों के लक्जऱी होम्स में बांस फर्नीचर नई पहचान बन चुका है।
आदिवासी हुनर को मिला नया मंच
यह स्टार्टअप सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि ग्रामीण सशक्तिकरण की मिसाल बन चुका है। वर्तमान में— 30-35 स्थानीय कारीगर यहां काम कर रहे हैं, कई आदिवासी महिलाएं घर बैठे उत्पाद तैयार कर रही हैं, बांस स्थानीय क्षेत्र और असम से मंगाया जाता है, बांस को पहले मशीनों से काटा और ट्रीट किया जाता है, फिर कारीगर अपने पारंपरिक हुनर से उसे आधुनिक डिज़ाइन का रूप देते हैं। यह मॉडल साबित करता है कि टेक्नोलॉजी और परंपरा साथ चल सकती हैं।
ग्रीन इकॉनॉमी का नया मॉडल
विशेषज्ञों के अनुसार, बांस आधारित उद्योग— पर्यावरण के लिए सुरक्षित रोजगार पैदा करने वाला कम लागत और ज्यादा मूल्य वाला टिकाऊ विकास का आदर्श उदाहरण यह यूनिट ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ का जीवंत उदाहरण बन चुकी है।
एक गांव से निकला ग्लोबल ब्रांड
सतना के इस छोटे से प्रयोग ने साबित कर दिया कि— अगर सोच बड़ी हो, तो गांव भी ग्लोबल ब्रांड बना सकता है। आज सोनौरा का बांस सिर्फ एक उत्पाद नहीं, बल्कि भारत के ग्रामीण नवाचार की पहचान बन चुका है।




