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हाँ याद है, मुझे मेरा बचपन!

सुकुनी और बेफ़िक्री से भरा मेरा बचपन—
यादों का एक बेपरवाह क़ाफ़िला।
किस्से-कहानियों में पला,
मौज-मस्ती से सना वह बचपन
जो नाना के पुरवा (बगीचा) और
नाना-नानी की बातों में जीता था।
माँ के अथाह प्यार से लेकर
डाँट-धुलाई तक का बचपन—
शरारत, भोलापन, नासमझी
और पागलपन का सुंदर मेल।
दोस्तों के साथ हमेशा साथ रहने, खेलने
और जीने-मरने की कसमें खाने वाला बचपन।
डाकू दल का मुखिया बनने के सपने,
छोरी होकर भी आवारागर्दी से न डरने का साहस—
धूल में सने खेल, खुले आँगन और चारदीवारी से मुक्त आज़ादी।
पिताश्री की सुबह-ए-चाय, भाइयों का लाड़,
बहनों का स्नेह, गाँव की मिट्टी
और गोदावरी—अपना अड्डा—
सब कुछ उसी बचपन में बसता है। हाँ… मुझे याद है मेरा वह ‘आवारा’ बचपन।
नोट: यहाँ “आवारा” का अर्थ बेफ़िक्र, बेख़ौफ़, बेहद और बेइंतहा से है।
— पूजा पटेल
(मैं और मेरी धुन)




