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विश्व कप में भारतीय गले में हार

सतना। हिंदुस्तान के अंदर क्रिकेट आज की तारीख में एक ऐसा खेल बन गया है कि भारत के अधिकांश लडक़े ककहरा सीखने में तो साल भर लगा देते हैं लेकिन क्रिकेट का बल्ला उठाने में उन्हें किसी गुरु की आवश्यकता नहीं होती आज क्रिकेट इतना सर्वव्यापी खेल हो चुका है कि हिंदुस्तान की हर गली और कूचा इस खेल से रोशन है। भारतीय टीम ने लगातार 10 मैच जीतकर जब फाइनल में प्रवेश किया तो ऐसा लगा की अनुभूति आंगन में आकाश उतर आया है।
अरबों हिंदुस्तानियों को यह उम्मीद थी कि भारत के लड़ाके भारत के सर पर विश्व विजेता का ताज जरूर रख देंगे लेकिन हमेशा की तरह भारत के लड़ाके अंतिम समय में अपना धैर्य खोकर धरातल पर उतर आते हैं। ऑस्ट्रेलिया के कप्तान कमिंग्स का आत्मविश्वास तो देखिए की मैच के पहले उन्हें कह दिया था की स्टेडियम में बैठे 130000 दर्शकों को मैं चुप करने का प्रयास करूंगा और उन्होंने वही किया लेकिन भारतीय टीम 130000 दर्शकों का समर्थन प्राप्त करने के बाद भी ऐसा कोई कारनामा नहीं कर पाई जिससे हिंदुस्तान का मस्तक पूरे विश्व में ऊंचा हो सके। ऐसा लगा कि भारतीय टीम ने टॉस हारने के बाद ही अपनी हार मान ली थी। रोहित शर्मा निश्चित तौर पर एक आक्रामक शिकारी की तरह ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों पर टूट पड़े लेकिन जिस तरीके से वह गैर जिम्मेदाराना तरीके से शॉर्ट खेल कर आउट हुए उसे देखकर यह कहा जा सकता है कि वह जीत के लिए नहीं बल्कि शोहरत के लिए खेल रहे थे। शुभमन गिल और अय्यर के खेल को देखकर ऐसा लगा जैसे यह दोनों खिलाड़ी भारतीय टीम में विभीषण की भूमिका में खड़े थे।
विराट कोहली और केएल राहुल ने जिस तरीके से पारी खेली उसे देखकर भी ऐसा लग रहा था कि जैसे यह भारतीय टीम को सुनहरा हार का खिताब पहनाने के लिए ही अहमदाबाद की पिच पर चहल कदमी कर रहे हैं। अगर विश्व के श्रेष्ठ रिकॉर्ड धारी विराट कोहली और किंग कोहली भी ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों के सामने नतमस्तक हो गए तो काहे के विराट। भारतीय लोग विराट को विराट तब मानते जब कंगारू के जबड़े से जीत निकालकर अरबों हिंदुस्तानियों के हाथ में जीत रख देते। भारतीय बैट्समैनों ने तो निराश किया ही था लेकिन भारतीय गेंदबाजों ने भी कम निराश नहीं किया सेमीफाइनल में जिस शमी ने सात विकेट लेकर अपना डंका बजाया था फाइनल में शमी भी डमी ही साबित हुए।
भारतीय गेंदबाज ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाजों की आंख में आंख डालकर उनका विकेट लेने में नाकाम रहे भले ही रिकॉर्ड के मानचित्र में गेंदबाज विश्व में एक बेहतर वरीयता के साथ खड़े हैं लेकिन ऐसी वरीयता किस काम की जब हम ऐतिहासिक क्षणों में पूछ दबाकर हार का वरण कर ले। जिस ऑस्ट्रेलिया को लीग मैच में भारत ने इसी विश्व कप में हराया उसी ऑस्ट्रेलिया से हम फाइनल मुकाबला हार गए इससे यह बात साबित होती है कि हमारा दृढ़ संकल्प अभी भी जीतने का नहीं बल्कि रिकॉर्ड बनाने का है यदि हमारा दर्द संकल्प जीत के लिए होता तो ऑस्ट्रेलिया हिंदुस्तान के ही मैदान से जीत कर ऑस्ट्रेलिया वापस नहीं जाती। बेहतर होगा भारतीय कोच भारतीय खिलाडिय़ों के सिरहाने पर संकल्प की एक मजबूत तकिया रखें जिसमें भारतीय खिलाड़ी दृढ़ संकल्प होकर जीत के प्रति अपनी भूख दिखाते हुए अरबों हिंदुस्तानियों को महत्वपूर्ण अवसरों पर जीत की सौगात देने की आदत डालें।

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