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साढ़े आठ लाख सीटें, लेकिन प्रवेश केवल साढ़े पांच लाख

भोपाल। मध्यप्रदेश में उच्च शिक्षा संस्थानों के सामने इस वर्ष प्रवेश का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। नए शैक्षणिक सत्र के लिए प्रवेश प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंचने के बावजूद स्नातक और स्नातकोत्तर की लगभग 2.85 लाख सीटें अब भी खाली हैं। स्थिति यह है कि कई सरकारी और निजी कॉलेज विद्यार्थियों तथा उनके अभिभावकों से सीधे संपर्क कर प्रवेश लेने का आग्रह कर रहे हैं, लेकिन अपेक्षित संख्या में छात्र नहीं पहुंच रहे। 31 जुलाई को प्रवेश की अंतिम तिथि निर्धारित है, जबकि दूसरे एवं अंतिम चरण की प्रक्रिया समाप्त होने में केवल कुछ दिन शेष हैं। ऐसे में कॉलेज प्रबंधन को उम्मीद कम और चिंता अधिक दिखाई दे रही है।
उच्च शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के 550 सरकारी और लगभग 800 निजी कॉलेजों में इस वर्ष करीब 8.5 लाख सीटें उपलब्ध हैं। 22 जुलाई तक इनमें से करीब 5.5 लाख सीटों पर ही प्रवेश हो पाया है। इनमें भी स्नातक प्रथम वर्ष में लगभग चार लाख विद्यार्थियों ने दाखिला लिया है, जबकि शेष सीटों के लिए पर्याप्त संख्या में विद्यार्थी नहीं मिल रहे हैं। कॉलेज लेवल काउंसिलिंग (सीएलसी) के दूसरे चरण के बाद भी विज्ञान, कला और वाणिज्य संकाय की खाली लगभग 3.5 लाख सीटों में से केवल 60 से 65 हजार सीटें ही भर सकी हैं।
बड़े शहरों में प्रवेश लगभग थमा
पिछले दो-तीन दिनों से भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे बड़े शहरों के अनेक कॉलेजों में नए प्रवेश लगभग रुक गए हैं। कॉलेज प्रबंधन का कहना है कि अंतिम तिथि नजदीक आने के बावजूद नए विद्यार्थी नहीं पहुंच रहे हैं। इसी कारण कई संस्थान फोन कॉल, व्यक्तिगत संपर्क और अन्य माध्यमों से विद्यार्थियों को प्रवेश के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
विशेषज्ञों ने बताए कई कारण
उच्च शिक्षा विशेषज्ञ प्रो. डॉ. कैलाश त्यागी के अनुसार सामान्य स्नातक पाठ्यक्रमों की मांग लगातार घट रही है। उन्होंने इसके पीछे कई प्रमुख कारण बताए। विद्यार्थी बीए और बीएससी जैसे पारंपरिक पाठ्यक्रमों की बजाय प्रोफेशनल और तकनीकी कोर्स चुन रहे हैं। कॉलेज और सीटों की उपलब्धता संबंधी सही जानकारी समय पर नहीं मिल पाती। सरकारी कॉलेजों में ई-उपस्थिति (75 प्रतिशत अनिवार्यता) का कड़ाई से पालन होने के कारण कई विद्यार्थी निजी कॉलेजों को प्राथमिकता देते हैं, जहां उपस्थिति को लेकर अपेक्षाकृत लचीलापन रहता है। बड़ी संख्या में विद्यार्थी 12वीं के बाद आईआईटी, नीट और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग संस्थानों का रुख कर रहे हैं।
बड़े शहरों में सबसे अधिक सीटें खाली
तुलनात्मक रूप से देखें तो भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर के लगभग 60 प्रतिशत सरकारी कॉलेजों में सीटें अभी भी रिक्त हैं। इन शहरों के निजी कॉलेजों में भी लगभग 40 प्रतिशत सीटें खाली पड़ी हैं। इससे स्पष्ट है कि प्रवेश का संकट केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं है, बल्कि निजी कॉलेज भी समान चुनौती का सामना कर रहे हैं।
बदलती पसंद बना रही चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि छात्रों की बदलती करियर प्राथमिकताएं, रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रमों की बढ़ती मांग और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की प्रवृत्ति ने पारंपरिक स्नातक एवं स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के लिए छात्रों की संख्या कम कर दी है। यदि आगामी दिनों में प्रवेश तिथि नहीं बढ़ाई गई, तो इस वर्ष प्रदेश के कॉलेजों में लाखों सीटें रिक्त रह जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इससे न केवल कॉलेजों की शैक्षणिक और वित्तीय व्यवस्था प्रभावित होगी, बल्कि उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात बढ़ाने के सरकारी लक्ष्य पर भी असर पड़ सकता है।

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