सांड का स्वच्छंद संसार, सतना रेलवे स्टेशन पर सोया सुरक्षा का सरदार!
सांड की सैर, सुरक्षा की शामत और साहबों की सुस्ती! केंद्र के कर्मचारियों की कैसी कर्मठता, जहां यात्री परेशान और पशु बेखौफ

सत्ता का सुरूर सिर्फ राज्य शासन के कर्मचारियों के सिर चढ़कर नहीं बोल रहा, केंद्र शासन के कर्मचारियों की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। सतना रेलवे स्टेशन का नजारा देखकर लगता है कि यहां व्यवस्था बेपटरी है, बदइंतजामी बेलगाम है और जिम्मेदारों की जवाबदेही गायब है। गायों की गश्त, कुत्तों का कब्जा और सांड की स्वच्छंद सैर—यही है सतना रेलवे स्टेशन की सुरक्षा व्यवस्था का सजीव संसार! सवाल यह है कि रेलवे स्टेशन यात्रियों की सुविधा के लिए है या आवारा पशुओं के आराम, आवास और अधिकार के लिए?
जयपुर रेल मंडल के महत्वपूर्ण स्टेशन सतना में यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों को आखिर दिखाई क्या देता है? प्लेटफॉर्म पर गाय घूम रही है, कुत्ते विचरण कर रहे हैं और सांड अपनी शाही सवारी के अंदाज में बेखौफ घूम रहा है। शहर में जिन्हें ठौर नहीं मिलता, उन्हें स्टेशन पर ठिकाना मिल गया है। बेघर इंसान रात बिताते हैं, बेजुबान पशु परिसर में डेरा जमाते हैं और जिम्मेदार अधिकारी शायद व्यवस्था के सपनों में खोए रहते हैं!
*जरा इस सांड की शान तो देखिए! न टिकट की चिंता, न प्लेटफॉर्म की पाबंदी, न नियमों का डर और न किसी अधिकारी का खौफ! दूसरी तरफ, कोई आम आदमी बिना प्लेटफॉर्म टिकट पकड़ा जाए तो जुर्माने की नौबत आ सकती है। लेकिन यह सांड बिना टिकट, बिना अनुमति और बिना रोकटोक स्टेशन पर विचरण कर रहा है। अब सवाल यह है कि नियमों की रस्सी सिर्फ आम आदमी के गले में ही क्यों पड़ती है? क्या रेलवे के नियम-कायदे पशुओं के सामने नतमस्तक हो जाते हैं?
वैसे सांड को सत्ता का नशा चढ़ा है, ऐसा कहना गलत होगा। उसे न सत्ता का ज्ञान है, न सरकारी आदेशों का भान। वह तो बेजुबान है, लेकिन जिन अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारी का ज्ञान और यात्रियों की सुरक्षा का भान होना चाहिए, उनकी निष्क्रियता पर सवाल जरूर उठते हैं। आखिर इस पशु को स्वच्छंद विचरण की छूट किसकी निगरानी में मिली हुई है?
देश में व्यवस्था का विचित्र विधान देखिए—हादसे से पहले खामोशी, हादसे के बाद सक्रियता; दुर्घटना से पहले दफ्तरों में आराम, दुर्घटना के बाद कार्रवाई का ऐलान!* अधिकारी अक्सर तब जागते दिखाई देते हैं, जब किसी की जान पर बन आती है। क्या रेलवे प्रशासन भी किसी अनहोनी की प्रतीक्षा कर रहा है?
अगर रेलवे स्टेशन पशुओं के लिए भी खुला आशियाना है, तो सतना के लोग अपने घरों के गाय-बैल और सांड यहां छोड़कर एक नया प्रयोग क्यों न करें? आखिर जब व्यवस्था को पशुओं की मौजूदगी से परेशानी नहीं, तो जनता को ही क्यों हो?
लेकिन व्यंग्य से व्यवस्था नहीं चलती, जिम्मेदारी से चलती है। रेलवे प्रशासन को तत्काल आवारा पशुओं की आवाजाही रोकनी चाहिए और लापरवाही के लिए जवाबदेही तय करनी चाहिए।
*सवाल सांड के स्टेशन पर घूमने का नहीं, सवाल जिम्मेदारों के सोने का है। सांड तो सींग दिखाकर चला जाएगा, लेकिन यदि दुर्घटना हुई तो जवाबदेही के सींग किसके सिर पर उगेंगे?




