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झूलेलाल जयंती पर विशेष

झूलेलाल जी को जल के देवता वरुण का अवतार माना जाता हैं. चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में चन्द्र दर्शन की तिथि को सिंधी चेटीचंड मनाते हैं. इनकी पूजा तथा स्तुति का तरीका कुछ भिन्न हैं जल के देव होने के कारण इनका मंदिर लकड़ी का बनाकर जल में रखकर इनके नाम दीपक जलाकर भक्त आराधना करते हैं. चेटीचंड के अवसर पर भक्त इस मंदिर को अपने शीश पर उठाते हैं जिन्हें बहिराना साहिब कहा जाता हैं जिनमें परम्परागत छेज नृत्य किया जाता हैं.सिंध प्रान्त से भारत में आकर भिन्न भिन्न स्थानों पर बसे सिंधी समुदाय के लोगों द्वारा झूलेलाल जी की पूजा की जाती हैं. ये उनके इष्ट देव हैं. सागर के देवता, सत्य के रक्षक और दिव्य दृष्टि के महापुरुष के रूप में इन्हें मान्यता दी गुई हैं. ताहिरी, छोले (उबले नमकीन चने) और शरबत आदि इस दिन बनाते हैं तथा चेटीचंड की शाम को गणेश विसर्जन की तरह बहिराणा साहिब का विसर्जन किया जाता हैं.भगवान झूलेलाल जी का जन्म चैत्र शुक्ल 2 संवत 1007 को हुआ था, इनके जन्म के सम्बन्ध में कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं. मगर इन सभी में बहुत सी समानताएं भी हैं यहाँ आपकों भगवान झूलेलाल जी की सर्वमान्य कथा बता रहे हैं जिन पर अधि कतर लोगों का विश्वास हैं.
बात सिंध इलाके की हैं 11 वीं सदी में वहां मिरक शाह नाम का शासक हुआ करता था. वह प्रजा का शासक कम अपनी मनमानी करने वाला जनता को तरह तरह की शारीरिक यातनाएं देने में आनन्द खोजने वाला अप्रिय एवं अत्याचारी था. उसके लिए मानवीय मूल्य तथा व्यक्ति जीवन गरिमा व धर्म कुछ भी मायने नहीं रखते थे.वरुणदेव उदेरोलाल ने जलपति के रूप में मछली पर सवार होकर लोगों को दर्शन दिया. तथा आकाशवाणी हुई कि हे भक्तों तुम्हारे दुखों का हरण करने के लिए मैं ठाकुर रतनराय के घर माँ देवकी के घर जन्म लूँगा तथा आपके जुल्मों को खत्म करूँगा.
चैत्र शुक्ल 2 संवत 1007 के दिन नसरपुर में माँ देवकी पिता रतनराय के घर चमत्कारी बालक ने जन्म लिया जिसका नाम उदयचंद रखा गया. जब शासक मीरक शाह को यह खबर मिली तो उसने अपने सेनापति को इस बालक का वध करने के लिए भेजा. सेनापति अपनी पूरी सेना के साथ नसरपुर के रतनराय जी के यहाँ पहुचकर बालक उदयचंद तक पहुचने का प्रयास किया तो झूलेलाल जी ने अपनी दैवीय शक्ति से शाह के राजमहल में आग लगा दी तथा उसकी फौज को पंगु बना दिया.
जब शाह की किसी ईश्वरीय शक्ति के ताकत का अंदाजा हुआ तो वह माँ देवकी के घर गया तथा झूलेलाल जी के कदमों में गिरकर अपने पापों की क्षमा मांगने लगा. इस तरह अल्पायु में ही झूले लाल जी ने आमजन में सुरक्षा का भरोसा दिलाया तथा उन्हें निडर होकर अपना कर्म करने के लिए प्रेरित किया.
सिंध का शासक मीरक शाह जिन्होंने झूलेलाल जी को मारने के लिए आक्रमण किया, उसका अहंकार चूर चूर हो गया तथा वह उनका परम शिष्य बनकर उनके विचारों को जन जन तक पहुचाने के कार्य में जुट गया. शाह ने अपने आराध्य के लिए कुरु क्षेत्र में एक भव्य मंदिर का निर्माण भी करवाया. सर्वधर्म समभाव तथा अमन का पैगाम देने वाले झूलेलाल जी एक दिव्य पुरुष थे.

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