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भ्रष्टाचार का काला सच, बिना लीज-परमिशन मुरुम, फिर भी लाखों का भुगतान

श्रीराम इंटरप्राइजेज नामक फर्म को मुरुम और अन्य सामग्री के नाम पर कुल 6 लाख 76 हजार 679 रुपये का भुगतान

शत्रुघन सिंह सतना।   ग्राम पंचायतों में पारदर्शिता के लिए बनाए गए पंचायत दर्पण पोर्टल पर दर्ज भुगतान अब सवालों के घेरे में हैं। मझगवां जनपद की ग्राम पंचायत पडऱी में मुरुम आपूर्ति के नाम पर किए गए लाखों रुपये के भुगतान से जुड़े दस्तावेज़ कई गंभीर अनियमितताओं की ओर इशारा कर रहे हैं। दस्तावेज़ों के अनुसार श्रीराम इंटरप्राइजेज नामक फर्म को मुरुम और अन्य सामग्री के नाम पर कुल 6 लाख 76 हजार 679 रुपये का भुगतान किया गया यह भुगतान 22 दिसंबर 2025 को एक साथ किया गया, जबकि फर्म के पास न तो मुरुम खनन की वैध लीज है और न ही परिवहन की अनुमति।

मझगवां जनपद की ग्राम पंचायत पडऱी का मामला उजागर
मामला मझगवां जनपद की ग्राम पंचायत पडऱी का है, जहां सरपंच और सचिव पर बिना निर्माण कार्य कराए लाखों रुपये का भुगतान एक निजी वेंडर को किए जाने के आरोप लगे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जिन कार्यों को दिखाकर पंचायत दर्पण में बिल लगाए गए हैं, वे कार्य धरातल पर हुए ही नहीं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि बिना भौतिक सत्यापन के इन बिलों का भुगतान आखिर कैसे कर दिया गया? ग्रामीणों ने आशंका जताई है कि कमीशन के खेल में फर्जी वेंडर बनाकर सरकारी राशि की बंदरबांट की जा रही है।

चार बिल, एक ही दिन भुगतान
पंचायत दर्पण पर दर्ज विवरण के अनुसार— 8 दिसंबर 2025 को बिल क्रमांक 9 के माध्यम से 3,56,885 रुपये 7 दिसंबर 2025 को 1,65,800 रुपये तीसरा बिल 4,89,994 रुपये चौथा बिल 1,05,000 रुपये इन सभी बिलों का भुगतान 22 दिसंबर 2025 को किया गया। पहले बिल में 2,06,613 रुपये मुरुम के नाम पर दर्शाए गए हैं। भुगतान का ईपीओ नंबर 3704689 बताया गया है।

जब खदान ही नहीं, तो मुरुम आया कहाँ से?

सूत्रों के अनुसार बरौंधा तहसील क्षेत्र सहित पूरे मझगवां अनुभाग में मुरुम की कोई स्वीकृत खदान नहीं है।  ऐसे में बाहरी फर्म द्वारा मुरुम आपूर्ति दिखाना सीधे तौर पर अवैध उत्खनन और सरकारी धन के गबन की ओर इशारा करता है। नियमों के मुताबिक ग्राम पंचायतें आवश्यकता पडऩे पर स्वयं अनुमति लेकर अपने क्षेत्र से मुरुम खनन और परिवहन कर सकती हैं। ऐसे में किसी निजी फर्म द्वारा मुरुम आपूर्ति दिखाया जाना सीधे तौर पर अवैध उत्खनन और अवैध परिवहन की आशंका को मजबूत करता है।

 

पहले भी हुई शिकायतें, कार्रवाई शून्य
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि इससे पहले भी पंचायत में लाखों रुपये के भ्रष्टाचार की शिकायत जनपद अधिकारियों से की गई थी, लेकिन जांच के नाम पर केवल औपचारिकता निभाई गई। किसी तरह की ठोस कार्रवाई नहीं होने से सरपंच और सचिव के हौसले और बढ़ गए हैं।

उपयंत्रियों की भूमिका पर भी सवाल
नाम न छापने की शर्त पर जनपद के एक कर्मचारी ने बताया कि फर्जी बिलों और मस्टर रोल का सत्यापन उपयंत्रियों की सह पर ही होता है। नीचे से ऊपर तक सब कुछ सेट रहने के कारण ही कार्रवाई नहीं हो पाती। ग्रामीणों का कहना है कि यदि पिछले साढ़े तीन वर्षों के कार्यों का निष्पक्ष भौतिक सत्यापन कराया जाए, तो 15 लाख रुपये से अधिक के भ्रष्टाचार का खुलासा हो सकता है।
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन इस बार पंचायत दर्पण में दिख रहे इस भ्रष्टाचार के सच पर कार्रवाई करेगा, या यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।

भौतिक सत्यापन पर उठे सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि जिन कार्यों के नाम पर ये भुगतान किए गए, उनका धरातल पर कोई अस्तित्व नहीं है। इसके बावजूद बिना भौतिक सत्यापन के बिलों का अनुमोदन कर भुगतान कर दिया गया। इससे सरपंच–सचिव के साथ-साथ संबंधित उपयंत्री और सत्यापन करने वाले अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में आ गई है।

कार्रवाई होगी या फाइलों में दबेगा मामला?
ग्रामीणों ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर सरपंच, सचिव, संबंधित उपयंत्री और श्रीराम इंटरप्राइजेज पर शासकीय राशि के दुरुपयोग व अवैध उत्खनन का प्रकरण दर्ज किया जाए। अब देखना यह है कि प्रशासन इस खुलासे को गंभीरता से लेता है या यह मामला भी अन्य शिकायतों की तरह जांच प्रतिवेदन तक सीमित रह जाएगा।

सचिव को नहीं है जानकारी: जब पंचायत सचिव उदय प्रताप सिंह से श्रीराम इंटरप्राइजेज को किए गये भुगतान और मुरुम के संबंध में जानकारी ली गई तो उन्होंने कहा कि बिलों के बारे में मुझे जानकारी नहीं है, मैं अभी बैठक में हूं।

सरपंच का नंबर बंद सरपंच चन्द्रवति कुशवाहा को पंचायत दर्पण में दर्ज नंबर 9552266555 पर कॉल किया गया लेकिन यह नंबर बंद रहा।

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