“भूत भी अब राष्ट्रीयता तय करने लगे?”

19 जनवरी को बाँदा में लगे दिव्य दरबार ने न केवल श्रद्धालुओं बल्कि मीडिया और जनता को हैरान कर दिया। कथित तौर पर बागेश्वर बाबा ने “पाकिस्तान की भाषा बोलने वालों का भूत उतारने” का दावा किया। दरबार में माइक थामे श्रद्धालु झूमते, चिल्लाते, जीभ लपलपाते और अंत में कथित “प्रेतराज” से पिटते दिखे। सवाल यह उठता है कि क्या अब भूतों की राष्ट्रीयता भी तय होने लगी है? क्या पाकिस्तान की भाषा बोलने वाला भूत अलग, हिंदी बोलने वाला भूत अलग?
स्थानीय भाषाओं जैसे अवधी, बुंदेली या ब्रज बोलने वाले भूत क्यों नहीं दिखे, यह भी चर्चाओं का हिस्सा बन गया है। विश्लेषकों का कहना है कि यह कोई साधारण आध्यात्मिक आयोजन नहीं, बल्कि राजनीति, धर्म और तमाशे का मिश्रण बन चुका है।
स्टेज पर चमत्कार, कैमरे में टीआरपी और नीचे बैठे श्रद्धालु—सब मिलकर बना रहे हैं एक नया आध्यात्मिक राष्ट्रवाद, जिसमें भाषा, धर्म और आस्था का परीक्षण एक साथ किया जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम को देखने के बाद सवाल उठता है: क्या आस्था के मंच पर भूत भी अब राजनीतिक पहचान के आधार पर उतारे जाएंगे?




