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नवजातों की जिंदगी से खिलवाड़! सतना जिला अस्पताल की एसएनसीयू में चूहों का राज, 24 दिन बाद जागा सिस्टम

सतना। सरदार वल्लभ भाई पटेल शासकीय जिला चिकित्सालय की सिक न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू — जहां जिंदगी की सबसे नाजुक सांसें बचाई जाती हैं — वहां चूहे मंगोड़ी खाते और दौड़ लगाते नजर आए, लेकिन स्वास्थ्य तंत्र 24 दिन तक गहरी नींद में सोता रहा। वीडियो वायरल हुआ, जनता में आक्रोश फैला, लेकिन जिम्मेदार अफसरों ने आंखें मूंदे रखीं। जब मामला मुख्य सचिव (सीएस) डैशबोर्ड पोर्टल तक पहुंचा और प्रदेश के प्रमुख सचिव स्वास्थ्य ने संज्ञान लिया, तब जाकर जिला अस्पताल में हडक़ंप मचा और आनन-फानन में जांच समिति बना दी गई।


जांच या औपचारिकता?
सिविल सर्जन डॉ. अमर सिंह द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति में— एसएनसीयू प्रभारी डॉ. सुधांशु गर्ग, आरएमओ डॉ. शरद दुबे, सहायक अस्पताल प्रबंधक डॉ. धीरेंद्र वर्मा शामिल हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है—
जिस यूनिट की निगरानी इन्हीं पर थी, वही अब खुद अपनी जांच करेंगे? मंगोड़ी लेकर भागता चूहा, सिस्टम भागता रहा वायरल वीडियो में एक चूहा मुंह में मंगोड़ी दबाए कंप्यूटर मॉनिटर के नीचे से निकलता, वाई-फाई राउटर पर चढ़ता और कैमरा देखते ही मंगोड़ी छोडक़र भाग जाता है। उसके पीछे-पीछे अन्य चूहे भी एसएनसीयू में दौड़ते दिखते हैं। यह वही यूनिट है जहां—प्री-टर्म डिलीवरी वाले नवजात सांस लेने में दिक्कत से जूझ रहे शिशु गंभीर संक्रमण से लड़ रहे बच्चे भर्ती रहते हैं.

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इतिहास से भी सबक नहीं लिया
इंदौर एमवाईएच अस्पताल में चूहों के कुतरने से दो नवजातों की मौत, जबलपुर विक्टोरिया अस्पताल के आईसीयू और ऑर्थो वार्ड में चूहों की धमाचौकड़ी इन घटनाओं के बावजूद सतना जिला अस्पताल में संक्रमण नियंत्रण सिर्फ फाइलों तक सीमित रहा।

प्रबंधन के दावे बेनकाब
अस्पताल प्रबंधन कहता है— हर वार्ड में रैट ट्रैप लगे हैं नियमित पेस्ट कंट्रोल होता है लेकिन एसएनसीयू में चूहों की मौजूदगी ने इन दावों को खोखला साबित कर दिया। इतना ही नहीं, एसएनसीयू ऑफिस में मंगोड़ी मिलना यह दर्शाता है कि स्टाफ द्वारा वार्ड के अंदर खाना-पीना किया जा रहा है — जो नवजातों के लिए सीधा मौत का खतरा है।

2009 से बना स्पेशल वॉर्ड, 2026 में बदहाल हालात
2009 में बने इस स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट में इन-बॉर्न, आउट-बॉर्न और बाद में एसएनसीयू यूनिट जोड़ी गईं, लेकिन इन्फेक्शन कंट्रोल, हाइजीन और मॉनिटरिंग आज भी भगवान भरोसे है।

सबसे बड़ा सवाल
24 दिन तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? जिम्मेदार अफसरों पर अब तक कोई सख्त कदम क्यों नहीं? क्या जांच के बाद भी मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? नवजात बोल नहीं सकते, लेकिन ये चूहे बहुत कुछ कह गए हैं.

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