फीस ली, फॉर्म निगल गया सिस्टम! 10वीं बोर्ड से बाहर होने की कगार पर प्रांशू, शिक्षा विभाग की नींद कब खुलेगी?

सतना। सरकारी स्कूलों की जवाबदेही पर एक और करारा तमाचा—जिले के मझगवां विकासखण्ड के बरौंधा क्षेत्र के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय नकैला में पढ़ने वाला कक्षा 10वीं का छात्र प्रांशू यादव 13 फरवरी से शुरू हो रही मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल की मुख्य परीक्षा से वंचित होने की कगार पर है। छात्र ने पूरे सत्र नियमित पढ़ाई की, प्रवेश शुल्क और परीक्षा फॉर्म की फीस भी जमा की, लेकिन परीक्षा फॉर्म ही अपलोड नहीं हुआ। नतीजा—एडमिट कार्ड नहीं, परीक्षा नहीं, और एक साल दांव पर।
नियमित छात्र का फॉर्म गायब, ‘छोड़े हुए’ छात्र का नाम सिस्टम में कैसे?
परिजनों के मुताबिक क्लास टीचर बृजेश सिंह चौहान (31 जनवरी को सेवानिवृत्त) ने प्रवेश व परीक्षा शुल्क लिया, पर फॉर्म भरने में लापरवाही बरती। जब प्रवेश पत्र मांगा गया तो स्कूल का जवाब चौंकाने वाला था—“प्रांशू यादव नाम के दूसरे छात्र का फॉर्म भर दिया गया है।” बताया गया कि वह दूसरा छात्र पिछले दो वर्षों से अनुत्तीर्ण होने के बाद पढ़ाई छोड़ चुका है और इस सत्र में प्रवेश ही नहीं लिया।
सवाल सीधा है—सक्रिय, नियमित छात्र का फॉर्म कैसे छूट गया और पढ़ाई छोड़ चुके छात्र का नाम सिस्टम में कैसे दर्ज हो गया? क्या यह सिर्फ मानवीय भूल है या मॉनिटरिंग तंत्र की पोल?
प्राचार्य की भूमिका पर भी उठे सवाल
परिजनों का आरोप है कि शिकायत के बाद भी प्राचार्य पुष्पा सिंह भादौरिया ने ठोस समाधान के बजाय “शांत रहने” की सलाह दी। बोर्ड परीक्षा जैसे संवेदनशील मामले में अंतिम सत्यापन, सूची मिलान और हैंडओवर प्रक्रिया की जिम्मेदारी किसकी थी? यदि शिक्षक से चूक हुई, तो संस्थान प्रमुख का सुपरविजन कहां था?

कलेक्टर कार्यालय तक पहुंचा मामला, न्याय की मांग
हताश परिजन कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और लिखित आवेदन देकर जांच व दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की। उनकी प्रमुख मांगें—
- छात्र को विशेष अनुमति/वैकल्पिक व्यवस्था से परीक्षा में शामिल कराया जाए।
- जिम्मेदार शिक्षक व प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय कर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
मानसिक आघात में छात्र, एक साल बर्बाद होने का खतरा
परिवार का कहना है कि घटना के बाद प्रांशू गहरे तनाव में है और पिछले दो दिनों से खाना-पीना तक छोड़ चुका है। एक साल की मेहनत पर पानी फिरने की आशंका ने घर का माहौल भारी कर दिया है।
बोर्ड परीक्षा ‘भाग्य भरोसे’ या विभागीय निगरानी?
हर साल बोर्ड फॉर्म भरने की अंतिम तिथि, सूची सत्यापन और एडमिट कार्ड मिलान जैसी प्रक्रियाएं तय होती हैं। फिर भी अगर एक नियमित छात्र का फॉर्म सिस्टम में दर्ज नहीं होता, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की चूक नहीं—पूरे निगरानी तंत्र की विफलता है।
- क्या अंतिम सूची अभिभावकों से क्रॉस-चेक नहीं कराई गई?
- सेवानिवृत्ति से पहले हैंडओवर में ऐसे महत्वपूर्ण मामलों की समीक्षा क्यों नहीं हुई?
- क्या विभागीय ऑडिट और मॉनिटरिंग सिर्फ कागजों तक सीमित है?
अब शिक्षा विभाग की परीक्षा
यह मामला केवल प्रांशू यादव का नहीं, बल्कि शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता की परीक्षा है। क्या विभाग त्वरित हस्तक्षेप कर छात्र को न्याय दिलाएगा, या फिर “प्रक्रिया” के नाम पर एक और साल यूं ही कुर्बान हो जाएगा?




