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नागौद–मैहर टू-लेन सड़क के नाम पर पत्थरों की लूट, ओवर बर्डन की आड़ में करोड़ों का अवैध खनन, ठेकेदार कटघरे में

सतना। नागौद–मैहर के बीच निर्माणाधीन 61 किलोमीटर लंबी टू-लेन सड़क परियोजना अब विकास नहीं, बल्कि खनन माफिया के लिए सोने की खान बनती नजर आ रही है। सड़क निर्माण के ठेकेदार मेसर्स रविशंकर जायसवाल पर ओवर बर्डन हटाने की अनुमति की आड़ में करोड़ों रुपये मूल्य के पत्थर के अवैध उत्खनन का गंभीर आरोप सामने आया है। उचेहरा तहसील के पटवारी हल्का भउरहा स्थित आराजी नंबर 97 में जिस अनुमति का उद्देश्य केवल मिट्टी और मलबा हटाना था, उसी का दुरुपयोग कर लगभग आधा एकड़ क्षेत्र में पत्थर की अवैध खुदाई कर ली गई। चौंकाने वाली बात यह है कि निकाला गया पत्थर खुलेआम सड़क निर्माण कार्य में खपाया जा रहा था।


प्रशासनिक छापे में खुली पोल
मामले की शिकायत मिलने पर एसडीएम उचेहरा सोमेश द्विवेदी, तहसीलदार ज्योति पटेल, जिला खनिज अधिकारी दीपमाला तिवारी एवं खनिज निरीक्षक राकेश देशमुख की संयुक्त टीम ने मौके पर पहुंचकर निरीक्षण किया। जांच में अवैध खनन की पुष्टि होते ही टीम ने एक पोकलेन मशीन और एक हाइवा वाहन को जब्त कर लिया। दोनों वाहन वर्तमान में परसमनिया पुलिस चौकी में खड़े कराए गए हैं।

सखौहा में 13 हजार घन मीटर पत्थर गायब!
जांच यहीं नहीं रुकी। सखौहा क्षेत्र में की गई पड़ताल में करीब 13 हजार घन मीटर पत्थर का अवैध खनन उजागर हुआ है। यह मात्रा साफ संकेत देती है कि मामला सिर्फ नियम उल्लंघन नहीं, बल्कि सुनियोजित अवैध खनन रैकेट का हो सकता है। जिला खनिज अधिकारी दीपमाला तिवारी ने स्पष्ट किया है कि नियमों के तहत ठेकेदार पर लगभग 5 करोड़ रुपये तक की पेनल्टी लगाई जा सकती है।

पटवारी की भूमिका भी संदिग्ध
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर खनन के बावजूद राजस्व अमला मौन क्यों रहा?
अवैध खनन की जानकारी समय पर उच्च अधिकारियों को नहीं देने के मामले में पटवारी उपेन्द्र पाल को एसडीएम उचेहरा द्वारा नोटिस जारी कर जवाब तलब किया गया है।

तीन और स्थानों पर खनन की आशंका
सूत्रों के मुताबिक उचेहरा तहसील क्षेत्र में तीन अलग-अलग स्थानों पर इसी ठेकेदार द्वारा अवैध खनन किए जाने की जानकारी सामने आ रही है। यदि यह पुष्टि होती है, तो मामला केवल पेनल्टी तक सीमित न रहकर एफआईआर और ब्लैकलिस्टिंग तक जा सकता है।
बड़ा सवाल
क्या सड़क परियोजनाओं की आड़ में खनन की खुली छूट दी जा रही है?
क्या प्रशासनिक निगरानी केवल कागजों तक सीमित है?
और क्या इस मामले में ऊपर तक जिम्मेदारी तय होगी?
फिलहाल खनिज विभाग द्वारा प्रकरण तैयार कर कलेक्टर न्यायालय में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, लेकिन असली परीक्षा अब कार्रवाई की निष्पक्षता की होगी।

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