“जमानत की चिट्ठी आ गई” लेकिन लेने कोई नहीं आया, अपने ही अपनों से ठुकराए गए 5 कैदी अब भी सलाखों के पीछे

सतना | जेल की सलाखों के पीछे हर दिन एक ही सवाल गूंजता है—“आज छूट मिलेगी क्या?” लेकिन सतना सेंट्रल जेल में बंद पांच कैदियों के लिए यह सवाल अब और भी पीड़ादायक हो गया है। हाईकोर्ट से जमानत मिल चुकी है, आज़ादी का रास्ता खुल चुका है, फिर भी ये कैदी जेल में ही बंद हैं, क्योंकि उन्हें लेने उनके अपने ही परिजन नहीं आ रहे। जेल प्रशासन के मुताबिक, अलग-अलग गंभीर मामलों में बंद इन कैदियों को उच्च न्यायालय से जमानत स्वीकृत हो चुकी है। कानून कहता है कि बेल बॉन्ड भरते ही रिहाई संभव है। लेकिन हकीकत यह है कि परिजन फोन नहीं उठा रहे, चिट्ठियों का जवाब नहीं दे रहे और जमानत भरने से साफ इनकार कर रहे हैं।
अपराध की सजा, परिवार की बेदखली
जिन कैदियों को कोई लेने नहीं आ रहा, वे हत्या, अप्राकृतिक कृत्य, पॉक्सो एक्ट और शासकीय कर्मचारी पर हमले जैसे संगीन आरोपों में जेल में बंद हैं। इनमें रायसेन जिले का रामकीर्तन दास (धारा 377), पन्ना का इमाम खान (हत्या), बिहार का गणेश शर्मा (पॉक्सो एक्ट), सतना के किटहा निवासी राजा भैया डोहर (आईपीसी 332-333) और पन्ना का नत्थूलाल प्रजापति (हत्या) शामिल हैं। जेल सूत्र बताते हैं कि इन अपराधों की वजह से परिवार ही इनसे मुंह मोड़ चुका है। समाज की तो बात ही क्या, अब अपने भी इन्हें अपनाने को तैयार नहीं हैं।
“कभी-कभी अपने भी साथ छोड़ देते हैं”
उप जेल अधीक्षक सोनवीर सिंह कुशवाहा का कहना है कि यह मामला सिर्फ गरीबी का नहीं लगता। उन्होंने बताया, “कुछ अपराध इतने गंभीर होते हैं कि परिजन भी मानसिक रूप से टूट जाते हैं। ऐसे में वे बंदी को दोबारा स्वीकार नहीं कर पाते। हालांकि बंदियों का पुनर्वास हमारी जिम्मेदारी है और हम लगातार परिजनों से संपर्क कर रहे हैं।”
आज़ादी पास है, लेकिन रास्ता बंद
आज ये पांचों कैदी उस स्थिति में हैं, जहां कानून ने उन्हें रिहा कर दिया है, लेकिन समाज और परिवार ने नहीं।
हर गुजरते दिन के साथ उनकी उम्मीदें और टूट रही हैं—क्योंकि जेल का ताला अब कानून नहीं, रिश्तों की बेरुखी खोलने से मना कर रही है।




