पोषण नहीं, प्रहसन! — स्कूल में दूध के नाम पर बच्चों से छल, कागज़ों में पोषण, ज़मीन पर पानी

महोबा से सामने आई घटना ने सरकारी दावों की पोल खोल दी है। प्राथमिक विद्यालय में मिड-डे मील के तहत बच्चों को दिए जाने वाले दूध में कथित रूप से इतनी मिलावट की गई कि पोषण योजना मज़ाक बनकर रह गई। आरोप है कि एक बाल्टी पानी में महज़ 1 लीटर दूध मिलाकर बच्चों को परोसा जा रहा था। सवाल सीधा है—क्या यही है बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता?
दावों का ढोल, हकीकत का शोर
प्रदेश सरकार, जिसकी कमान योगी आदित्यनाथ के हाथों में है, शिक्षा और पोषण योजनाओं को लेकर लगातार बड़े-बड़े दावे करती रही है। करोड़ों रुपये खर्च, सख्त निर्देश, नियमित मॉनिटरिंग—कागज़ों में सब कुछ दुरुस्त दिखता है।
लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह बताती है कि जिम्मेदार तंत्र या तो सो रहा है या फिर आंखें मूंदे बैठा है। यदि एक स्कूल में खुलेआम दूध में पानी मिलाकर बच्चों को परोसा जा सकता है, तो यह केवल एक विद्यालय की चूक नहीं, बल्कि पूरी निगरानी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है।
जिम्मेदार कौन?
- क्या विद्यालय प्रबंधन को इसकी जानकारी नहीं थी?
- क्या आपूर्ति करने वाले ठेकेदारों की जांच होती है?
- क्या खंड शिक्षा अधिकारी और बेसिक शिक्षा विभाग नियमित निरीक्षण करते हैं?
- अगर निगरानी व्यवस्था सक्रिय होती, तो बच्चों के हक का दूध यूँ पानी नहीं बनता।
बच्चों के भविष्य से खिलवाड़
मिड-डे मील योजना का उद्देश्य कुपोषण से लडऩा और बच्चों को स्वस्थ भविष्य देना है। लेकिन जब पोषण की जगह दिखावा परोसा जाए, तो यह योजना अपने मकसद से भटक जाती है। यह केवल लापरवाही नहीं—यह नैतिक दिवालियापन है।




